<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><rss xmlns:atom='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' version='2.0'><channel><atom:id>tag:blogger.com,1999:blog-10204034</atom:id><lastBuildDate>Thu, 19 Nov 2009 09:57:28 +0000</lastBuildDate><title>ज्ञान-विज्ञान</title><description>यहां मिलेगा केवल ज्ञान ही ज्ञान, लीजिये ताज़े अन्वेंशणों की जानकारी, प्रकृति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा इत्यादि।</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/</link><managingEditor>noreply@blogger.com (खयाल)</managingEditor><generator>Blogger</generator><openSearch:totalResults>45</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-581406197846573551</guid><pubDate>Fri, 15 Aug 2008 08:04:00 +0000</pubDate><atom:updated>2008-08-15T01:04:53.282-07:00</atom:updated><title>test</title><description>&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=aq4m9s895mrw&amp;amp;ping=http://vigyaan.blogspot.com/" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"&gt;&lt;img src="http://www.chitthajagat.in/chavi/chitthajagatping.png" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-581406197846573551?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2008/08/test.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112468612376186304</guid><pubDate>Mon, 22 Aug 2005 04:45:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-08-21T21:48:43.766-07:00</atom:updated><title>बोस-आइंस्टाइन सिद्धांत की मूल प्रति मिली</title><description>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;बोस और आइंस्टाइन के सिद्धांत पर नोबेल पुरस्कार समिति की वेबसाइट का पन्ना नीदरलैंड में एक छात्र ने अल्बर्ट आइंस्टाइन के हाथ के लिखे कुछ अनमोल पन्ने ढूँढ निकाले हैं जो उन्होंने भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस के साथ मिलकर किए गए शोध के दौरान लिखे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोबेल पुरस्कार की वेबसाइट का कहना है कि भारतीय वैज्ञानिक बोस ने प्रकाश के मूल तत्व फोटोन के बारे में गहन शोध किया था। उन्होंने अपना शोध आइंस्टाइन को भेजा था जिससे वे बहुत प्रभावित हुए और बोस के शोध पत्र का ख़ुद जर्मन में अनुवाद किया और उसे एक प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित कराया। बोस के इस सिद्धांत को आइंस्टाइन ने और आगे बढ़ाया और उन्होंने न सिर्फ़ प्रकाश बल्कि अन्य पदार्थों के अणुओं का भी अध्ययन उसमें जोड़ दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइंस्टाइन-बोस सिद्धांत का कहना था कि शून्य से काफ़ी नीचे के तापमान पर गैस के अणु अपनी ऊर्जा पूरी तरह खो देते हैं और वे एक नई अवस्था में चले जाते हैं जहाँ एक अणु को दूसरे से भिन्न करना संभव नहीं रहता।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/08/050821_einstien_bose.shtml"&gt;&lt;br /&gt;पूरी खबर&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112468612376186304?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/08/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>13</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112381968220899699</guid><pubDate>Fri, 12 Aug 2005 04:00:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-08-11T21:09:53.850-07:00</atom:updated><title>आलिंगन और स्वास्थय</title><description>अब वैज्ञानिकों ने भी ये पता लगाया है कि आलिंगन स्वास्थय के लिये लाभदायक है, ख़ासतौर पर उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारियों के लिये।&lt;br /&gt;&lt;p class="storytext"&gt;ये भी पाया गया है इसका असर महिलाओं पर ज़्यादा होता है। अमरीका के नॉर्थ कैरोलाइना विश्वविद्यालय में किए गए एक अध्ययन के अनुसार आलिंगन से ऑक्सीटोसिन नाम के एक हार्मोन में बढ़ोत्तरी होती है जो इन बीमारियों से बचाता है। विश्वविद्यालय ने अड़तीस दम्पत्तियों पर शोध करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;p class="storytext"&gt;अब &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मुन्नाभाई एमबीबीएस&lt;/span&gt; में दिखाई गयी जादू की झप्पी तो वैज्ञानिक तथ्य हो गई है इसलिये उन लोगों को तो अब ये स्वीकरना ही पड़ेगा जिन्होंने फ़िल्म देखने के बाद इसको हंसी समझ के उड़ा दिया था।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;p class="storytext"&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/08/050810_hugs_health.shtml"&gt;पूरी खबर&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt; &lt;p class="storytext"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112381968220899699?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/08/blog-post_112381968220899699.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112381916267763171</guid><pubDate>Fri, 12 Aug 2005 03:56:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-08-11T20:59:22.683-07:00</atom:updated><title>गाने और सॉफ़्टवेयर</title><description>खबर है कि पंजाब इन्जीनियरिंग कालेज के छात्रों ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया है जिसके ज़रिये किसी भी रेडियो स्टेशन के फिल्मी संगीत के कार्यक्रम सीधे लोगों तक प्रसारित किये जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के इन छात्रों, कंगन अरोड़ा, भावना राय, सौम्य जैन, अतुल गुप्ता और साधना नागपाल का दावा है कि उनके 'म्यूजिक ऑन डिमांड' नाम के सॉफ़्टवेयर से कोई भी रेडियो प्रोड्यूसर कुछ ही पलों में किसी भी श्रोता की फ़रमाइश का गीत ढ़ूंढकर प्रसारित कर सकता है। इस प्रक्रिया की मदद से फ़रमाइशी संगीत के कार्यक्रमों को पहले से रिकॉर्ड करने की ज़रूरत नहीं रह गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2005/08/050811_punjab_software.shtml"&gt;पूरी खबर &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112381916267763171?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/08/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112365467690582994</guid><pubDate>Wed, 10 Aug 2005 06:17:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-08-09T23:17:56.910-07:00</atom:updated><title>डिस्कवरी सकुशल वापस लौटा</title><description>डिस्कवरी सकुशल वापस लौटा&lt;br /&gt;नासा का अंतरिक्ष यान डिसकवरी, अपनी यात्रा पूरी करके सकुशल वापस पहुँच गया. दुनिया भर के लोगो की निगाहे इसके सकुशल वापस लौटने पर थी. आपके ज्ञात होगा, डिसकवरी की पिछली उड़ान से वापस आते वक्त सात अंतरिक्ष यात्रियों जिसमे भारत की कल्पना चावला भी थी, की मौत हो गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नासा ने डिसकवरी के सकुशल पहुँचने पर राहत की सांस ली होगी, क्योंकि इसके सफल या असफल होने पर नासा की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हुई थी. पूरा समाचार &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/08/050809_discovery_return.shtml"&gt;यहाँ &lt;/a&gt;पर पढें.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112365467690582994?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/08/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (Jitendra Chaudhary)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112356990262050585</guid><pubDate>Tue, 09 Aug 2005 06:42:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-08-08T23:47:41.056-07:00</atom:updated><title>कुत्ते का क्लोन</title><description>अब &lt;a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/sci/tech/2764039.stm"&gt;डॉली भेड़&lt;/a&gt; के बाद कुत्ते का भी क्लोन आ गया है और इसको बनाया है दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने। देखना ये है कि ये क्लोनिंग केवल मज़े के लिये हो रही है या फिर इससे चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ अच्छा हो पाता है।  और बात ये भी देखनी है कि ये कुत्ता भी बेचारा जिन्दा रहता है या फिर बीमारियों या विकृतियों का शिकार होकर मर जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/sci/tech/4742453.stm"&gt;पूरी खबर&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112356990262050585?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/08/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112082325316650261</guid><pubDate>Fri, 08 Jul 2005 11:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-08-08T23:27:34.073-07:00</atom:updated><title>भारतीय ग्रामीण अन्वे्षक</title><description>भारत के गांवों में बसते हैं आविष्कारक&lt;br /&gt;&lt;a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/world/south_asia/4650065.stm"&gt; उत्साहवर्धक लेख&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112082325316650261?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/07/blog-post_08.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-112021930517986011</guid><pubDate>Fri, 01 Jul 2005 11:50:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-07-02T04:14:31.706-07:00</atom:updated><title>हिमनादों का पिघलना</title><description>वैज्ञानिकों ने बताया है कि भारत के प्राचीन हिमनाद यानी ग्लेशियर इस सदी के अंत तक पिघल सकते हैं। ये वो हिमनाद हैं जिनसे कि गंगा नदी में पानी आता है। और अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि अनुमान से ज़्यादा होती है तो ये और जल्दी हो सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार वैश्विक तापमान में वृद्धि का कारण कार्बन डाइ ऑक्साइड व अन्य गैसों का अत्यधिक मात्रा में उत्सर्जन है। ये जैसें सूरज की गर्मी को अपने अंदर रखती हैं और इससे पृथ्वी और वातावरण दोनों गर्म रहते हैं। इससे भारत के साथ नेपाल, पाकिस्तान और बाङग्लादेश भी प्रभावित हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमनादों का पिघलना एक चिन्ता का कारण है क्योंकि इससे लाखों करोड़ों किसानों व उनसे जुड़े अन्य लोगों की रोज़ी रोटी प्रभावित होगी, ऐसे लोग जो कि कृषि पर निर्भर हैं। हालांकि कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन का अधिकांश भाग अमेरिका व चीन द्वारा उत्सर्जित किया जाता है, भारत भी पीछे नहीं है। भारत में टैम्पो जैसे कुख्यात वाहन इस समस्या को और विकराल बना रहे हैं। तापमान बढ़ने के साथ साथ धूलकणों और गैसों को श्वास के द्वारा अन्दर लिये जाने पर हृदय सम्बन्धी बीमारियां भी बढ़ेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/07/050702_glacier_mountain.shtml"&gt;पूरी खबर&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-112021930517986011?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/07/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111936712261097647</guid><pubDate>Tue, 21 Jun 2005 15:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-06-21T08:19:14.330-07:00</atom:updated><title>पेट्रोल का संभावित विकल्प</title><description>&lt;span class="mainHead"&gt;नवभारत में प्रकाशित &lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/1146709.cms"&gt;खबर&lt;/a&gt; के अनुसार गोरखपुर स्थित गोविंद गौशाला के संस्थापक न्यासी प्रह्लाद ब्रह्मचारी का काम गोबर गैस से कार्बन डाइ आक्साइड और मीथेन गैसों को अलग करके पेट्रोल का एक विकल्प, बोतलबंद मीथेन, तैयार कर देगा और इस विकल्प की कीमत पेट्रोल की आधी है। सच में यदि ये सफल रहा तो ऐसा बहुत ही अच्छा होगा हमारे देश के लिये। नीचें पढ़ें विस्तार से:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 255, 102);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span class="mainHead"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(204, 0, 0);"&gt;पेट्रोल से आधी कीमत पर तैयार ईंधन से दौड़ेंगी  कारें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;लखनऊ (भाषा): हो सकता है आने वाले समय में पेट्रोल से आधी कीमत पर तैयार ईंधन से कारें दौड़ने लगें और देश में दूध की नदियां बहने लगें! इस सपने को सच बनाने का प्रयास कर रहे हैं, गोरखपुर स्थित गोविंद गौशाला के संस्थापक न्यासी प्रहलाद ब्रह्मचारी। अपने सहयोगियों की मदद और अदम्य लगन से उन्होंने अपनी गौशाला में गोबर गैस से कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन को अलग करके मीथेन की बाटलिंग प्रणाली विकसित की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीथेन की बाटलिंग का यह प्रयोग अगर सफल रहा, तो इससे देश में एक आर्थिक क्रांति आ सकती है। गाय-भैंसें कामधेनु बनकर देहातों को स्वर्ग बना सकती हैं और कारें पेट्रोल से आधी कीमत पर प्रदूषण मुक्त ईंधन के सहारे दौड़ सकती हैं। गोबर गैस में 65 फीसदी मीथेन, 34 फीसदी कार्बन डाई ऑक्साइड और एक फीसदी हाइड्रोजन सल्फाइड होता है। ब्रह्मचारी के मुताबिक, हालांकि बाटलिंग रासायनिक तरीके से भी संभव है, मगर उन्होंने इसके लिए 'क्रायोजनिक सुपर कूलिंग प्रणाली' अपनाई। ऐसा करने में मीथेन तो अलग हुआ ही, कार्बन डाई ऑक्साइड जमकर सूखी बर्फ बन गई, जिसका रेफ्रीजिरेशन में व्यावसायिक और बहुआयामी उपयोग होता है। उन्होंने बताया कि एक किलो मीथेन से पुरानी मारुति वैन भी 25 किलोमीटर तक चल जाती है, जबकि थ्री व्हीलर 40-45 किलोमीटर तक चल सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, ब्रह्मचारी कोई इंजीनियर नहीं, सिर्फ कॉमर्स ग्रेजुएट हैं। उनका सपना था कि वह अपनी गौशाला को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाएं और इसी वजह से उन्होंने गोबर गैस की बाटलिंग की ठानी। वह दो साल तक इंटरनेट और केमिस्ट्री की किताबें छानते रहे। इस सिलसिले में वह आईआईटी दिल्ली भी गए। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। अब वह अपनी गौशाला में बने 45 क्यूबेक मीटर क्षमता के गोबर गैस संयंत्र से प्रतिदिन 4 किलोग्राम क्षमता के चार सिलिंडर भर रहे हैं। बाटलिंग की पूरी प्रक्रिया अपनाने में औसत 5 रुपये प्रति किलोग्राम खर्च उन्हें आ रहा है। उनके गौशाला में इंपोर्ट किया हुआ कंप्रेसर युक्त प्लांट 400 वर्ग फुट से कम के ही क्षेत्रफल में बना हुआ है। उन्होंने बताया कि कम लागत पर मीथेन बाटलिंग का काम व्यावसायिक स्तर पर किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111936712261097647?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/06/blog-post_21.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111919492284274346</guid><pubDate>Sun, 19 Jun 2005 15:24:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-06-19T08:48:09.246-07:00</atom:updated><title>प्राचीन  भारतीय विज्ञान</title><description>आज ये एक कड़ी देखी जिसमें कि प्राचीन भारतीयों (मैं हिन्दू का प्रयोग नहीं करूंगा क्योंकि मुझे नहीं लगता कि प्राचीन भारतीय अपने आप को हिन्दू कहते थे, वे दूसरों को आर्य और खुद को वेदिक कहते थे) द्वारा किये गये वैज्ञानिक आविष्कारों का एक छोटा सा वर्णन है और इसकों छोटे चलचित्रों के द्वारा भी दिखाया गया। आश्चर्य है कि इनमें से कितनी चीज़ें हमको स्कूलों में नहीं पढ़ाई जाती हैं। कड़ी &lt;a href="http://www.infinityfoundation.com/mandala/t_es/ht_es_science_frameset.htm"&gt;यहां&lt;/a&gt; पर देखी जा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111919492284274346?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/06/blog-post_19.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111865951407776664</guid><pubDate>Mon, 13 Jun 2005 10:34:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-06-13T03:45:14.180-07:00</atom:updated><title>विज्ञान से जुड़ा एक लेख</title><description>आज नवभारत टाइम्स में एक आलेख पढ़ा जिसमें भारतीय विज्ञान से जुड़ी कुछ चिन्ताओं को उजागर किया गया है। मैं कुछ मुद्दों से सहमत हूं । लेखक हालांकि हिंग्लिशिया अंदाज के प्रेमी हैं और अखबार भी ऐसे ही छाप रहा है। साइंस विज्ञान कहा जाता है सबको मालूम है और परसेंट को प्रतिशत या फ़ीसदी कहते हैं ये भी, फिर भी पता नहीं क्यों सम्पादक महोदय इस सब चीज़ों पर ध्यान क्यों नहीं देते, हिन्दी ऐसी कठिन तो नहीं है। खैर आप नीचे लेख को पढ़ें:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="mainHead"&gt;&lt;/span&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/1139044.cms"&gt;&lt;span class="mainHead"&gt;साइंस के हवाई किले &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हरीश अग्रवाल&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इधर साइंस में कुछ अभूतपूर्व हुआ है। साइंस मालामाल हो गई है। उसे पहले कभी इतना धन  नहीं मिला। प्राइम मिनिस्टर की सांइटिफिक एडवाइजरी काउंसिल ने ऐलान किया है कि  नैशनल साइंस एंड इंजीनियरिंग फाउंडेशन की स्थापना की जाएगी और इंडियन इंस्टिट्यूट  ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) में बेसिक साइंस के अध्ययन के लिए अधिक छात्र भर्ती किए  जाएंगे। फाउंडेशन के लिए एक हजार करोड़ रुपये का वार्षिक बजट रखा जाएगा, जिसका  इस्तेमाल यूनिवर्सिटियों में बेसिक साइंस को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा। एक और  काम यह होगा कि बेंगलूर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस को इतना बेहतर बनाया जाएगा  कि वह वर्ल्ड क्लास बन जाए और उसकी तुलना एमआईटी जैसे नामी संस्थानों से होने लगे।  पिछले कुछ बरसों से (2000 से 2005 तक) साइंस का बजट बढ़ता चला आया है। साइंस,  इंडस्ट्रियल रिसर्च, बायो टेक्नोलॉजी और समुदीय साइंस पर खर्च हर साल लगभग 11  परसेंट के रेट से बढ़ता गया। इस साल के बजट में तो इन चार विभागों के खर्च में 28  परसेंट की बढ़ोतरी की गई, जो 800 करोड़ रुपये बैठती है। पिछले बरसों में शुरू से  एटमिक एनर्जी और स्पेस साइंस के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा धन दिया जाता था। इस परंपरा  से सरकार इस बार हट गई है। अब काफी पैसा नेनो टेक्नोलॉजी पर लगाया जाएगा। इसके लिए  एक नैशनल मिशन की स्थापना की गई है। इस पर पांच साल में 10 अरब रुपये खर्च होंगे,  क्योंकि इसे 'सनराइज' यानी उदय हो रही टेक्नोलॉजी माना जा रहा है। कुछ हलकों में  साइंस के लिए इतना धन दिए जाने की आलोचना हो रही है। पूछा जा रहा है कि क्या केवल  पैसा उड़ेलने से ही भारत बड़े देशों की बराबरी पर आ जाएगा, भले ही हमारे पास कुशल  साइंटिस्ट न हों? इन आलोचकों का कहना है कि रातोंरात कामयाबी के महल नहीं खड़े किए  जा सकते। आजादी के बाद अनेक संस्थान बनाए गए, लेकिन क्या मिला? क्या यह जरूरी नहीं  कि नए अमीर संस्थानों को बेहतरीन प्रतिभाओं के साथ बेहतरीन प्रयोगशालाएं मिलें?  बदकिस्मती यह रही है कि हम रिसर्च के लिए विदेशी उपकरण मंगाते हैं, जिनमें से  ज्यादातर रखरखाव के अभाव में बेकार हो जाते हैं। फिर सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि  आज का कोई छात्र साइंस ही क्यों चुनेगा, जबकि उसके सामने मॉडलिंग से लेकर कॉल सेंटर  तक दसियों आकर्षक रास्ते खुले हैं। कुछ समय से हमारे न जाने कितने इंजीनियर एमबीए  या आईटी में चले गए हैं। लिहाजा चिंता जताई जा रही है कि क्या भारत इतने अधिक धन का  इस्तेमाल सार्थक शोध कार्यक्रमों में कर सकेगा? एक टॉप साइंटिस्ट का कहना है कि  पैसे की कमी कोई समस्या नहीं थी। असली फिक्र साइंटिस्टों की कमी की है और ऐसे  प्रोजेक्टों की, जिनमें पैसा लगाया जाना चाहिए। इधर कहा जा रहा है कि अब ब्रेन  ड्रेन की धारा उलट गई है, हमारे अनेक साइंटिस्ट स्वदेश लौट रहे हैं। लेकिन आज भी  विदेश चले जाने वाले कुशल युवा साइंटिस्टों की तादाद कोई कम नहीं है। ऐसे में कैसे  देश के आईआईटी अपने यहां बेसिक साइंसेज के लिए पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों की भर्ती कर  सकेंगे? क्या वे अतिरिक्त फैकल्टी की स्थापना कर पाएंगे? इन्हीं पहेलियों से घिरा  एक बड़ा तथ्य यह है कि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का साइंस पर कुछ उलटा ही असर पड़ा  है। सॉफ्टवेयर और आईटी सर्विस में भारत की योग्यता से अरबों डॉलर उसकी झोली में आ  गए और हजारों युवकों को नौकरियां मिलीं, लेकिन इसकी कीमत बेसिक साइंस को चुकानी  पड़ी है। इससे साइंस में रिसर्च का बंटाधार हो गया है। अब कोई उस साइंस में जाना  नहीं चाहता, जहां से डॉक्टरेट लेकर भी नौकरी नहीं मिलती। अब लगता है कि साइंस में  पीएचडी का कोई मतलब नहीं रहा। इस स्थिति का हल नए संस्थान बनाने या पैसा देने के नए  तरीके खोजने में नहीं है। नए साइंस फाउंडेशन के लक्ष्य भी साफ नहीं हैं। साइंस  विभाग की साइंस रिसर्च काउंसिल बरसों से रिसर्च के लिए पैसा बांटती आई है। क्या कभी  यह ऑडिट हुआ है कि इस पैसे से क्या फायदे हासिल हुए हैं। दूसरी एजेंसियों से भी इसी  तरह बहुत सारा पैसा बह कर बर्बाद होता रहा है। अब कहा जा रहा है कि फाउंडेशन का  ढांचा इस प्रकार का होगा, जिससे साइंस को ब्यूरोक्रेसी से आजाद रखा जा सके। इसका  मतलब है कि मौजूदा संस्थानों और संगठनों पर ब्यूरोक्रेसी का शिकंजा इस कदर मजबूत हो  चुका है कि उन्हें आजाद करना मुमकिन नहीं। कम से कम सरकार यही मानती लगती है। 2003  की साइंस टेक्नोलॉजी पॉलिसी (एसटीपी) में कहा गया है कि आज सबसे अधिक जरूरत है  प्रभावशाली, पारदर्शी तथा सांइटिफिक मॉनीटरिंग और रिव्यू की। हमें साहस तथा  ईमानदारी के साथ यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि साइंस व टेक्नोलॉजी का हमारा काम एक  जगह ठहर गया है, जबकि चीन तथा ब्राजील जैसे देश कहां से कहां पहुंच गए। एक प्रमुख  वैज्ञानिक गोवर्धन मेहता का कहना है- 'साइंस को समर्थन तथा बढ़ावा देने का सिस्टम  सरकारी विभागों से अलग होना चाहिए।' कहने का मतलब यह है कि साइंस का निजाम  ब्यूरोक्रेसी की मनमर्जी पर न चले। साइंस ही अपनी कसौटी आप हो और उस पर खर्च  योग्यता तथा कुशलता के समान अनुपात में हो। हमें अपनी साइंस में हाई लेवल रिसर्च को  जगह दिलानी होगी, जिसमें युवा वर्ग बढिया से बढिया करियर तलाश कर सके। देश के  प्रस्तावित मून मिशन, खगोल उपग्रह या न्यूट्रिनो वेधशाला जैसे हाई प्रोफाइल  प्रोजेक्टों की तरफ अवश्य ही युवा आकृष्ट होंगे। इस बीच बेसिक साइंसेज में रोजगार  के पर्याप्त अवसर बनाने होंगे, खास तौर से यूनिवर्सिटियों में। फिलहाल तो ऐसा कुछ  नहीं है। सरकार और वैज्ञानिक समुदाय के सामने इस स्थिति को बदलने की चुनौती है।  साइंटिस्ट डॉ. विजय राघवन का कहना है कि भारत में साइंस को ब्लड ट्रांसफ्यूजन की  जरूरत है। मसलन यूनिवर्सिटियों में बेहतरीन किस्म के रिसर्चर होने चाहिए। प्राइम  मिनिस्टर की एडवाइजरी काउंसिल के एक अन्य मेम्बर का कहना है कि मौजूदा फंडिग  मेकेनिज्म से बंधी अफसरशाही साइंस को नुकसान पहुंचा रही है। बायो टेक्नोलॉजी, एटमिक  एनर्जी और डिफेंस रिसर्च विभागों के प्रोजेक्ट तुरत-फुरत मंजूर हो जाते हैं, जबकि  अन्य संगठनों को दो-दो साल इंतजार करना पड़ता है। यहां तक देखा गया है कि रिसर्च  ग्रांट वेतन देने आदि कामों में लगा दी जाती है, जिससे रिसर्च का काम पिछड़ जाता  है। दो साल पहले कैबिनेट की साइंस एडवाइजरी कमिटी ने साइंस में ब्यूरोक्रेसी खत्म  करने के लिए एक रिपोर्ट दी थी। इसमें 10 बदलाव लाने की सलाह दी गई थी, लेकिन उसकी  केवल एक सिफारिश मंजूर की गई। यहां तक कि खुद साइंटिस्टों ने प्रोजेक्टों की  समीक्षा के बाद जो सिफारिशें कीं, वे भी मंजूर नहीं हुईं। ऐसी स्थिति में  प्रस्तावित फाउंडेशन को ये सभी उलझनें दूर करनी होंगी, तभी वह असर डाल सकता है।  संस्थानों में काम करने वाले साइंटिस्टों को पूरी आजादी और ऑटोनोमी देनी होगी। अगर  ऐसा नहीं किया गया, तो भारतीय साइंस में लगे घुन को दूर करना मुश्किल होगा। उसकी  योजनाएं हवाई किले बनकर रह जाएंगी।&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111865951407776664?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/06/blog-post_13.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111789181187724029</guid><pubDate>Sat, 04 Jun 2005 13:09:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-06-04T06:30:11.880-07:00</atom:updated><title>वैश्विक तापमान वृद्धि</title><description>आज मैंने ये रोचक &lt;a href="http://www.worldviewofglobalwarming.org/"&gt;जालपृष्ठ&lt;/a&gt; देखा वैश्विक तापमान वृद्धि के आंकड़ों पर। लेख के अनुसार विश्व के पर्यावरण में बदलाव आतंकवाद से भी ज़्यादा खतरनाक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ज़्यादा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले देशों में अपना पड़ोसी चीन है जो कि विश्व में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश होने के साथ साथ ज़्यादा संसाधनों का भी इस्तेमाल कर रहा है। जैसे के कोयले के प्रयोग में ये नंबर एक है और कार्बन डाइ ऑक्साइड प्रदूषण के मामले में नंबर दो है। समुद्र के किनारे वाले देखों को काफ़ी खतरा है क्योंकि वहां पानी का स्तर बढ़ने के साथ बाढ़ भी अक्सर आने लगी है उदाहरणार्थ तुवालू द्वीप में जो कि भूमध्य रेखा पर स्थित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो उत्तर प्रदेश में ही देखा है कि गर्मी कितनी विकट हो गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिये पहले आज के पर्यावरण में अन्तर नीचे दिखाये चित्र में देखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src="http://news.bbc.co.uk/nol/shared/spl/hi/picture_gallery/05/sci_nat_how_the_world_is_changing/img/1.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी जानकारी के लिये &lt;a href="http://www.worldviewofglobalwarming.org/"&gt;जालस्थल&lt;/a&gt; देखें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111789181187724029?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/06/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111744324000470928</guid><pubDate>Mon, 30 May 2005 08:13:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-05-30T05:51:37.633-07:00</atom:updated><title>मानव शरीर से चार्ज हो सकता है मोबाइल</title><description>आपके पास मोबाइल फोन है, नेटवर्क भी ध्वस्त नहीं है फिर भी बात नहीं हो पा रही है तो क्या कारण हो सकता है? या तो हैन्डसेट खराब है या फिर  मोबाइल की बैटरी डिस्चार्ज हो गयी है। हैंडसेट की खराबी तो मोबाइल कम्पनी वाले दूर करेंगे पर अगर बैटरी खत्म हो गई है तो मोबाइल को अपनी बगल में दबा लीजिये और 'हेलो' कहिये-शायद बात हो जाये। पर पहले यह खबर तो पढ़ लीजिये जो हिंदी दैनिक &lt;strong&gt;हिंदुस्तान &lt;/strong&gt;के २९ मई के लखनऊ संस्करण में &lt;strong&gt;संदीप रिछारिया &lt;/strong&gt;कि मार्फत छपी:-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;कहते हैं आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है । पर चित्रकूट के अब्दुल मुबीन सिद्दीकी को अविष्कार करने के लिए आवश्यकता की नहीं बल्कि विषय मात्र की आवश्यकता थी। मौका मिला और इस युवक ने अपनी प्रतिभा का छोटा सा नमूना दुनिया के सामने  रख दिया है। खिलौने खेलने की उम्र में ही पेंचकस और प्लास पसंद करने वाले अब्दुल मुबीन सिद्दीकी ने शरीर के द्वारा मोबाइल फोन चार्ज करने वाले यंत्र का अविष्कार कर साधन और सुविधाओं का रोना रोने वालों के सामने अपनी नवीन शोध के रूप में चुनौती पेश कर दी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी कम्पनी के मोबाइल फोन को शरीर से चार्ज करने का दावा करने वाले सिद्दीकी कहते हैं कि कानपुर से लखनऊ की यात्रा के दौरान जब उन्हें अपने परिचितों -परिजनों से मोबाइल फोन के द्वारा बात  करने की आवश्यकता महसूस हुई तो बैटरी डिस्चार्ज मिली। इलेक्ट्रानिक्स में गहरी दिलचस्पी रखने वाले मुबीन ने उसी दिन से शरीर से चार्ज होने वाले मोबाइल फोन के बारे में सोचकर ताना-बाना बुनना प्रारम्भ कर दिया। शुरुआती दौर में असफलताएं हाथ लगीं।समय बीतता गया ,अपनी धुन के पक्के मुबीन इस खोज में लगे रहे।लगभग दो वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद बीते १८ अप्रैल की रात दो बजकर बीस मिनट पर नोकिया के हैन्डसेट को यंत्र द्वारा चार्ज होते देख मुबीन एक बार तो खुशी के मारे पागल से हो गये। खुशी के मारे उनकी आँखें आंसुओं से भर गईं। घर और मोहल्ले वालों को जब मुबीन के नए शोध की जानकारी मिली तो पूरे मोहल्ले में उत्सवी माहौल छा गया। सुबह होते-होते बधाइयों का ताँता लग गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने नये अविष्कार को लेकर मुबीन महात्मा गांधी चित्रकूट गामोदय विवि के इलेक्ट्रानिक्स संकाय के प्रमुख प्रो. अवध श्रीवास्तव के पास पहुँचे। डा. अवध श्रीवास्तव ने उसे जाँच परखकर जन उपयोगी नवीन शोध कर लेने पर बधाई दी। साथ ही उसे चार्जिंग यंत्र का आकार छोटा करने को कहा। अपने नवीन शोध की जानकारी देने मुबीन जिलाधीश रंजन कुमार के पास पहुँचा। आई.आई.टी. कानपुर के छात्र रहे व इलेक्ट्रानिक्स में गहरी दिलचस्पी रखने वाले जिलाधिकारी ने मोबाइल चार्जिंग यंत्र का विधिवत परीक्षण कर अब्दुल मुबीन सिद्दीकी को उनकी नई खोज के लिए बधाई देते हुए कहा कि यह जन उपयोगी यंत्र आने वाले समय में अत्यधिक लोगों द्वारा प्रयोग किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस यंत्र के अविष्कारक अब्दुल मुबीन सिद्दीकी सिलसिलेवार पूरी जानकारी देते हैं। वह बताते हैं कि थर्मामीटर के सिद्धान्त पर उनका यंत्र बना है। यंत्र के निर्माण में मर्क का सिद्धान्त उपयोग में लाया गया।इस यंत्र को हाथों में दबाकर ढाई घंटे में व काँख में दबाने पर डेढ़ घंटे में पूरी तरह चार्ज किया जा सकता है। मुबीन कहते हैं कि इस यंत्र के उपयोग में किसी भी तरह का कोई साइड इफेक्ट नहीं है। कहा है कि इस खोज की बात सुनकर कुछ बड़ी मोबाइल कम्पनियों के प्रतिनिधियो द्वारा उनसे सम्पर्क साधने का प्रयास किया गया। पर बड़ी कम्पनियों के बारे में अपनी राय बेबाकी से रखने वाले मुबीन कहते हैं कि इस शोध को वह स्वयं पेटेन्ट करायेंगे। मुबीन की ख्वाहिश है कि उनकी इस खोज से कम पैसे में अच्छी चीज बाजार में आये।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखना है कितना उपयोग हो सकता है इस खोज का। वैसे जहाँ बिजली रहती है वहाँ के लोग तो डे़ढ घंटे अपनी काँख में मोबाइल दबाने से रहे। हाँ यह वहाँ के लिये उपयोगी है जहाँ मोबाइल फोन है,नेटवर्क है पर बिजली या तोनदारत रहती है या नखरे करती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111744324000470928?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/05/blog-post_30.html</link><author>noreply@blogger.com (अनूप शुक्ल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111670527852019218</guid><pubDate>Sat, 21 May 2005 19:46:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-05-21T12:54:38.523-07:00</atom:updated><title>गोबर से बिजली</title><description>क्या आपने कभी सोचा है कि गोबर से बिजली बन सकती है? गोबर गैस प्लांट की मदद से कई सारे काम करने के बारे में तो मालूम है लेकिन सीधे गोबर से बिजली बनाना कुछ नया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीबीसी हिंदी में प्रकाशित एक &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/04/050419_power_cowdung.shtml"&gt;लेख&lt;/a&gt; के अनुसार बाराबंकी जिले के एक गांव पूरेझाम, जो सुल्तान पुर रोड पर हैदरगढ़ कस्बे से पांच किमी की दूरी पर है, के निवासी ब्रजेश त्रिपाठी ने एक प्रयोग शुरू किया जिसमें कि उनहोंने कुल्हड़ों में गोबर भरकर बल्ब जलाने में सफलता प्राप्त की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह बिजली बनाने के लिए वह झालर वाले सस्ते चीनी बल्व और बेकार हुए तीन बैट्री सेल लेते हैं। बैट्री सेल का कवर उतार कर उसमें पाजिटिव निगेटिव तार जोड़ देते हैं और फिर इन्हें अलग-अलग तीन कुल्हड़ में भरे गोबर के घोल में डाल देते हैं। इस घोल में थोड़ा सा नमक, कपड़ा धोने का साबुन या पाउडर मिला देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/images/2005/04/20050419130700gobar_powerplant203.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह घर बैठे रोशनी पैदा करने का प्रयोग सफल देख पूरेझाम में घर-घर लोग बिजली बनाने लगे। आसपास के सैकड़ों गाँवों में भी लोग इस तरह लाइट जला रहे हैं। बिजली बनाने का यह फार्मूला गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को भी समझ में आ गया है. बच्चों का कहना है कि इस लाइट से पढ़ाई में बहुत मदद मिलती है। इसकी रोशनी लालटेन जैसी है। इस तरह सस्ती और आसान बिजली मिलने से गाँव वाले प्रसन्न और आश्चर्यचकित हैं, हालांकि उनको यह नहीं मालूम कि कुल्हड़ भर गोबर और पुराने बैट्री सेल में ऐसी कौन सी रासायनिक क्रिया होती है, जिससे बिजली बनती है। गाँव वालों को उम्मीद है कि जब तकनीकी जानकार लोग इस प्रयोग में हाथ लगाएंगे तो एक बेहतर टेक्नॉलॉजी बनकर तैयार होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111670527852019218?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/05/blog-post_22.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111651709345062516</guid><pubDate>Thu, 19 May 2005 15:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-05-19T08:38:13.456-07:00</atom:updated><title>प्रकृति को देखें</title><description>मैंने अभी हाल ही में नेशनल जियोग्राफिक पर ये &lt;a href="http://www.nationalgeographic.com/forcesofnature/"&gt;कड़ी&lt;/a&gt; देखी, अच्छी लगी। आप भी देखिये।  यहां पर प्रकृति की विनाशकारी शक्तियों (भूकम्प, ज्वालामुखी, तूफान) का अच्छा विवरण व दृश्यावलोकन है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111651709345062516?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/05/blog-post_19.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111590103242640189</guid><pubDate>Thu, 12 May 2005 12:29:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-05-12T05:30:32.433-07:00</atom:updated><title>आंख की रोशनी का इलाज</title><description>&lt;b&gt;वैज्ञानिकों ने आँख की कुछ ऐसी कोशिकाएँ बनाने का दावा किया है जो प्रकाश के लिए बहुत संवेदनशील होती हैं और जिनसे कुछ तरह के अंधेपन का इलाज संभव है।  विस्तृत जानकारी के लिये &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/01/050131_eye_cells.shtml"&gt;यहां &lt;/a&gt;पढ़ें।&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111590103242640189?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/05/blog-post_12.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111574694904990720</guid><pubDate>Tue, 10 May 2005 17:37:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-05-10T10:42:29.083-07:00</atom:updated><title>पर्यावरण और जानवर</title><description>वैज्ञानिकों के अनुसार यदि विश्व का तापमान इसी प्रकार बढ़ता रहा तो पृथ्वी से हाथी, बाघ और गैँडे जैसे जानवरों के विलुप्त होने का खतरा है। पूरी जानकार के लिये &lt;a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/sci/tech/4522663.stm"&gt;यहां&lt;/a&gt; पढ़ें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भई मानव की विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को दोहने की भूख यदि इसी प्रकार से बढ़ती रही तो वो समय दूर नहीं जब इस धरती पर न पेड़ पौधे बचेंगे, न अनाज पैदा होगा, पानी भी खतम (जो बचेगा वो विषैला होगा) और धीरे धीरे जानवर भी खतम, फिर केवल इंसान (या हैवान) बचेगा, इस धरती का राजा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या करेगा वो अकेला?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111574694904990720?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/05/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111460514314992714</guid><pubDate>Wed, 27 Apr 2005 12:22:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-04-27T05:32:23.153-07:00</atom:updated><title>जूट की सड़कें</title><description>भारत में शायद अब शीघ्र ही जूट की सड़कें बनायी जायेंगी। इस तकनीक को &lt;a href="http://www.iitkgp.ac.in"&gt;आई आई टी खड़गपुर &lt;/a&gt;के दो वैज्ञानिकों ने विकसित किया। उनके अनुसार इनसे बनने वाली सड़कें मजबूत होंगी, भारत के मौसम के अनुकूल होंगी और समय के साथ उनका क्षय नहीं होगा क्योंकि जूट केवल सीधे धूप में खराब होता है, अन्यथा नहीं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक दलदली भूमि, बलुई मिट्टी, ज़्यादा नमी वाली मिट्टी और बाढ़ प्रभावित इलाकों में कामयाब होगी, जहाँ आमतौर पर तारकोल वाली सड़कें कामयाब नहीं हो पातीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;&gt;सड़क बनाने के लिए जूट की लगभग आधा इंच मोटाई की लंबी-लंबी जमावट फैक्ट्री में की तैयार जाएगी. जिसे 'जूट मैट' कहा जा सकता है. “जूट मैट” को फैक्ट्री थान में तैयार किया जाता है। इसके बाद मिट्टी की सड़क तैयार की जाएगी. उस पर वह जूट मैट बिछा दिया जाएगा। फिर मिट्टी की मोटी परत होगी, उस पर ईंट की ज़मावट करके उसके ऊपर तारकोल की पतली परत डाल दी जाएगी।  इस तरह जूट की सड़क तैयार हो जाएगी। &lt;/&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तकनीक केवल तारकोल या डामर-ईंट-गिट्टी वाली तकनीक से पांच लाख रूपये प्रति किलोमीटर सस्ती पड़ेगी।  तो सोचिये कि १००० किमी लम्बी सड़क बनाने में ५० करोड़ की बचत। इसको पॉच राज्यों में पायलट स्तर पर कार्यान्वित करने के लिये केंद्र सरकार की भी मंजूरी मिल चुकी है, अब देखते हैं कि ये तकनीक भारतीय बाबुओं और अधिकारियों के रहते कितना आगे बढ़ पाती है और लोगों की मदद करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विस्तृत जानकारी के लिये &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/04/050426_roads_jute.shtml"&gt;यहां &lt;/a&gt;पढ़ें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111460514314992714?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/04/blog-post_27.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111424147130644979</guid><pubDate>Sat, 23 Apr 2005 07:22:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-04-23T00:31:11.306-07:00</atom:updated><title>ब्रह्मांड का पहले का रूप</title><description>वैज्ञानिकों के अनुसार पहले के वर्षों में ब्रह्मांड कुछ कुछ द्रव के जैसा था। अमेरिका स्थित ब्रूकहोवन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने स्वर्ण कणों को लगभग प्रकाश की गति पर चलाकर उनको आपस में टकराया और पाया कि यद्यपि ये टकराव बहुत कम आयतन में होता है, फिर भी इससे इतनी ऊर्जा पैदा होती है कि परमाणु की नाभि के प्रोटॉन और न्यूट्रान जैसे कण पिघल जाते हैं और यहां तक कि क्वार्क और ग्लुऑन जैसे छोटे कण भी मस्त मौला होकर घूमते हैं और द्रव के समान व्यवहार करते हैं। वैज्ञानिक इन परिस्थितियों को ब्रह्मांड की शुरुआत से जोड़कर देख रहे हैं। पूरी जानकारी के लिये &lt;a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/sci/tech/4462209.stm"&gt;यहां &lt;/a&gt;पढ़ें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111424147130644979?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/04/blog-post_23.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111310975416906553</guid><pubDate>Sun, 10 Apr 2005 05:07:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-04-09T22:09:14.170-07:00</atom:updated><title>पुरुषों के लिये नया परिवार नियोजन का इन्जेक्शन</title><description>भारत मे जनसंख्या की बहुत बड़ी समस्या है, और इसके प्रति थोड़ी थोड़ी जागरुकता दिखने लगी है, लेकिन अक्सर परिवार नियोजन के लिये महिलाओ को ही कुछ उपाय अपनाने पड़ते थे, मानो कि पुरूषों की कोई जिम्मेदारी ही नही है. संजय गांधी ने नसबन्दी लाकर और एक बहुत बड़ा हव्वा खड़ा कर दिया था, जबरन नसबन्दी से भी इस प्रयास को नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर अब आइआइटी खड़गपुर के वैज्ञानिको ने एक ऐसा &lt;a href="इन्जैक्शन इजाद किया है"&gt;इन्जैक्शन इजाद किया है&lt;/a&gt; जिसके लगाने से पुरूष के शरीर मे शुक्राणु निष्क्रिय हो जायगे, वो भी एक दो महीने नही, पूरे पूरे दस साल. और पुरुष जब चाहें तब इस इन्जेक्शन के प्रभाव को खत्म किया जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस इन्जेक्शन के प्रारम्भिक परीक्षण सफल साबित हुए है और जल्दी ही इसे बाजार मे उतारा जायेगा और कीमत, यही कोई 40-50 रूपये. है ना मजेदार बात. एक और बात, अब चूँकि मामला शुक्राणुओ का है, इसलिये इन्जेक्शन भी उसी नस पर लगाया जायेगा, जहाँ से शुक्राणु निकलते है, सो थोड़ी सावधानी तो रखनी ही पड़ेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर इन्तजार कीजिये इस इन्जेक्शन के बाजार मे उतरने का.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111310975416906553?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/04/blog-post_10.html</link><author>noreply@blogger.com (Jitendra Chaudhary)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111258303097295141</guid><pubDate>Mon, 04 Apr 2005 02:32:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-04-03T19:50:30.973-07:00</atom:updated><title>शून्य की महत्ता</title><description>अभी कुछ समय पहले एक पुस्तक पढ़ रहा था &lt;a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/tg/detail/-/0471295639"&gt;"&lt;b class="sans"&gt;Against the Gods: The Remarkable Story of Risk&lt;/b&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;/span&gt;"  &lt;/a&gt;कहानी है आदमी ने कैसे सामान्य जीवन से जुड़े खतरों को बस में करने शुरु किया। वे खतरे जिन्हें पहले जो भगवान को मंजूर कह कर आदमी कुछ नहीं करता था। मजे की बात है इस बारे में सबसे पहले लोगों ने पासे की अगली चालों पर आने वाले अंको के बारे में जानकारी के लिए प्रयोग करना शुरु किया था। लेखत श्री पीटर बर्नस्टीन बताते हैं कि खतरों को बस में करने का मानव का सबसे पहला कदम भारतीय-अरबी अंक प्रणाली की खोज थी। इस से पहले दूसरी अंक प्रणालियों में सामान्य गणित का जमा घटा बहुत मुश्किल था। सोचिए यदि आप को रोमन के XXXIX और MC को गुणा करना पड़े। इस भारतीय अंक प्रणाली की खोज में भी सबसे बड़ा फंडा था शून्य की खोज।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शून्य की खोज की महत्ता से जुड़े और बहुत से तथ्य हैं पर जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह थी पहली बार किसी ने abstract thinking की। शून्य का वैसे जीवन में क्या स्थान है। आप शून्य किलो आटा नहीं ला सकते। शून्य मील चला नहीं जा सकता। लेकिन महीषियों ने इस बारे में सोचा। यह मानव की सोच के लिए एक बहुत बड़ी छलांग थी। कभी मौका मिले तो यह पुस्तक अवश्य पढ़िएगा। बड़े रोचक  तरीके से लिखी गई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111258303097295141?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/04/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (मिर्ची सेठ)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111090039969833182</guid><pubDate>Tue, 15 Mar 2005 15:16:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-03-15T07:26:39.700-08:00</atom:updated><title>सौर ऊर्जा</title><description>आज मैं शोध संबन्धित विषय पर कुछ पढ़ते समय सौर बैटरी के बारे में सोच रहा था (जिसमें कि मेरी रुचि है), तो मन में  खयाल आया कि क्या सौर ऊर्जा को बिजली में बदलने का केवल सौर बैटरी ही एक ज़रिया है या फिर कुछ और भी विकल्प हो सकता है जो कि सौर बैटरी से बेहतर हो।  ये इसलिये क्योंकि सौर बैटरियां सेमीकंडक्टर पदार्थों की बनी होती हैं जो कि बहुत मंहगे होते हैं, उनको बनाने में काफ़ी प्रदूषण होता है और चूंकि उनकी ऊर्जा को परिवर्तित करने की क्षमता बहुत कम (~१-१५%) होती है इसलिये बहुत बड़े सौर पैनलों का प्रयोग किया जाता है। हालांकि पॉलीमर पदार्थ इस दिशा में काफ़ी कारगर साबित हो सकते हैं पर उनकी ऊर्जा परिवर्तन क्षमता तो अभी और भी कम है (~1%)। इसलिये खयाल आया कि क्या और भी कोई विकल्प हो सकता है इस अथाह सौर ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित करने का जो कि बेहतर हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विचार जारी है!!!!  ह्म्म्म्म्म्म्म! विचार आमन्त्रित हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111090039969833182?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/03/blog-post_15.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111078172874900098</guid><pubDate>Mon, 14 Mar 2005 06:24:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-03-13T22:28:48.750-08:00</atom:updated><title>ग्लेशियर पिघल रहे हैं</title><description>अब गर्मी से हिमनाद यानी ग्लेशियर भी अछूते नहीं है, &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/03/050314_himalayan_glaciers.shtml"&gt;पिघल रहे हैं जम कर &lt;/a&gt;और इसका खामियाज़ा भुगतेंगे भारत, चीन और नेपाल मुखय रूप से।  क्या वैज्ञानिक तरक्की है इन देशों कि प्रकृति को भी नहीं छोड़ा।   पश्चिम वाले तो हमसे ज़्यादा जागरूक हैं इस दिशा में।  जब नदियों में पानी ही नहीं बचेगा तो बेचारे किसान और उसकी खेती का क्या होगा और फिर जो हम सस्ता अनाज खाते हैं उसका क्या होगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111078172874900098?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/03/blog-post_14.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-111003617678231094</guid><pubDate>Sat, 05 Mar 2005 14:12:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-03-12T04:37:38.366-08:00</atom:updated><title>धुंआ सूंघक की कार्यप्रणाली</title><description>विदेश जाने के पहले मुझे पता नहीं था कि घरों या मकानों 'धुंआ सूंघक या घ्राणक' यानी Smoke Detector जैसी कोई चीज लगी रहती है। वैसे चीज़ है बड़े काम की और आजकल तो भारत में भी कई आलीशान इमारतों यानी होटलों, इनफ़ोसिस जैसी कम्पनियों की आलीशान इमारतों इत्यादि में ये महाशय या महाशया लगे रहते/लगी रहती हैं। वैसे अब आगे के लेख में मैं पुर्लिंग का ही प्रयोग करूंगा , महिलाओं से क्षमा मांगता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;img src="http://static.howstuffworks.com/gif/smoke-ch.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;वैसे ये महाशय हैं बड़ी काम की चीज। ये कई लोगों की आग से जान बचा सकते हैं, कीमत भी कुछ खास नहीं है, सबसे सस्ता करीब ५०० रूपये का आता है। और आकार भी छोटा सा ही होता है, तकरीबन ८-१२ सेमी व्यास यानी डायामीटर घरेलू उपयोग के लिये। और इनकी ऊर्जा की मांग भी काफ़ी कम होती है, आप इनको ९-१२ वोल्ट की बैटरी लगाकर चला सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, तो मैंने ये सोचा कि ये भाई साहब काम कैसे करते हैं, इनकी नाक इतनी दिव्य कैसे है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन भाई साहब के दो मुख्य भाग होते हैं: एक तो मुख्य यंत्र जो कि धुंआ सूंघता है और दूसरा होता है एक जोरदार हार्न यानी भोंपू जिनका काम होता है लोगों को चेताना। मैं इस लेख में सूंघने वाले यंत्र की चर्चा विस्तार से करूंगा क्योंकि पता तो वही लगाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ये जो यंत्र है वो दो प्रकार के हो सकते हैं: &lt;span style="font-style: italic;"&gt;क&lt;/span&gt;- &lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 0, 0);"&gt;फोटोइलेक्ट्रिक सूंघक&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-style: italic;"&gt;ख&lt;/span&gt;-&lt;span style="color: rgb(153, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;आयोनाइज़ेशन सूंघक&lt;/span&gt;।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो पहले देखते हैं ये फोटोइलेक्ट्रिक सूंघक कैसे काम करते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटोइलेक्ट्रिक सूंघक का यदि हम संधिविच्छेद करें तो फोटो का मतलब है प्रकाश फोटोन से यानी प्रकाश ऊर्जा को लेकर चलने वाला अतिसूक्ष्म कण, इलेक्ट्रिक मतलब विद्युत से, और सूंघक यानी डिटेक्टर जो कि इन दोनों प्रभावों से मिलकर बनता है और काम करता है। फोटोइलेक्ट्रिक सिद्धांत के अनुसार कुछ पदार्थों पर यदि प्रकाश पड़ता है तो उससे इलेक्ट्रान उत्पन्न होते हैं और फिर विद्युत धारा का प्रवाह उत्पन्न हो जाता है, जैसा कि नीचे चित्र में दिखाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;img src="http://theory.uwinnipeg.ca/physics/quant/img6.gif" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अब सूंघक पर फोटोन की जितनी ऊर्जा पड़ेगी वो उतनी ही विद्युत धारा (और वोल्टेज यानी विभव) उत्पन्न करेगा और यदि बिल्कुल प्रकाश नहीं पड़ेगा तो धारा बिल्कुल उत्पन्न नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचे दिखाये गये चित्र १ में यदि देखें तो उसमें श्रोत किनारे ऊपर की ओर लगा है, सूंघक नीचे की तरफ़ बीच में और प्रकाश बिना सूंघक की तरफ जाये बाहर जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img style="width: 260px; height: 206px;" src="http://static.howstuffworks.com/gif/smoke1.gif" /&gt;(१)&lt;img style="width: 263px; height: 207px;" src="http://static.howstuffworks.com/gif/smoke2.gif" /&gt; (२)&lt;br /&gt;(A-प्रकाश श्रोत, B-डिटेक्टर यानी सूंघक)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यदि हम श्रोत के सामने कुछ ऐसे कण डाल दें जिससे कि प्रकाश छितर जाये तो कुछ प्रकाश सूंघक की ओर भी जायेगा। जैसे ही वहां प्रकाश जायेगा, तो वहां कुछ धारा प्रवाहित होगी और पीछे का जुड़ा हुआ कोई भी सर्किट काम करने लगेगा क्योंकि हम अब उसमें विद्युत प्रवाह उत्पन्न कर सकते हैं (उदाहरणार्थ सौर बैटरी) और वो सर्किट हार्न का हो सकता है। एक चीज है कि इस सूंघक में बहुत कम धुयें जैसे कि सिगरेट के धुयें से हार्न नहीं चलेगा क्योंकि धुयें की मात्रा विद्युत धारा के प्रवाह को रोकने या कम करने के लिये बहुत कम होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दूसरे तरह के सूंघक को देखते हैं: &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आयनाइज़ेशन सूंघक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सूंघक काफ़ी प्रचलित हैं क्योंकि ये एक तो कम धुयें में काम कर सकते हैं और दूसरा ये काफ़ी सस्ते भी होते हैं। पर इसमें होता है एक नाभिकीय या रेडियोएक्टिव तत्व अमेरिसियम-२१ जो कि अल्फा कण का अच्छा श्रोत है और इसकी अर्ध आयु है ४३२ साल। अल्फा किरणें गामा किरणों की तरह बहुत घातक भी नहीं होती हैं इसलिये कोई खतरा भी नहीं है और सूंघक के अन्दर इसकी मात्रा भी बहुत कम होती है: लगभग १ माइक्रोग्राम। हां एक चीज का खयाल रखना पड़ता है कि इसको मुंह या नाक के रास्ते अंदर नहीं जाने देना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात करते हैं कि ये काम कैसे करता है। इसका सिद्धांत कहुत ही सरल है, दो विपरीत आवेशित प्लेटों के बीच में अमेरीसियम के कणों द्वारा बनी हुयी अल्फ़ा किरणें प्लेटों के बीच हवा में मौज़ूद नाइट्रोजन और आक्सीजन गैस के अणुओं को आयनीकृत कर देती हैं अर्थात उनके बाहरी इलेक्ट्रानों को निकाल देती हैं जिससे कि ये अणु धनावेशित हो जाते हैं और ये और ऋणावेशित इलेक्ट्रान क्रमशः विपरीत आवेशित प्लेटों की तरफ़ प्रवाहित होते हैं, जिससे कि विद्युत धारा का प्रवाह होता है (नीचे दिये गये चित्र में देखें)। इस सूंघक में इलेक्ट्रानिक्स इस तरह की होती है कि वो कम से कम विद्युत धारा के प्रवाह को भी माप सके। अब जब धुंआ इस प्रवाह के बीच में आता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;table align="center" cellpadding="3" cellspacing="0" width="400"&gt;  &lt;tbody&gt; &lt;tr&gt; &lt;td&gt; &lt;center&gt;&lt;img src="http://static.howstuffworks.com/gif/smoke3.gif" /&gt;&lt;/center&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="vertical-align: top;"&gt;&lt;br /&gt;    &lt;/td&gt; &lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;       &lt;td style="vertical-align: top;"&gt;&lt;br /&gt;    &lt;/td&gt;       &lt;td style="vertical-align: top;"&gt;&lt;br /&gt;    &lt;/td&gt;     &lt;/tr&gt; &lt;/tbody&gt; &lt;/table&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो वो इस आयनीकृत आक्सीजन और नाइट्रोजन के अणुओं से चिपक जाता है और उनको आवेश हीन या न्यूट्रल बना देता है जिससे कि विद्युत धारा का प्रवाह कम हो जाता है और इस कमी को सूंघक की इलेक्ट्रानिक्स द्वारा माप लिया जाता है और ये सिग्नल हार्न बजा देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आइये देखते हैं कि ये अन्दर से कैसा दिखता है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src="http://static.howstuffworks.com/gif/inside-smoke2.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अन्दर की चीज़े हैं: एक बक्सा जहां आयनीकरण होता है और वहीं अमेरीसियम स्थित है, एक हार्न और बाकी इलेक्ट्रानिक्स।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है न एक छोटी सी चीज पर कितने काम की और कितने सरल सिद्धांत पर काम करती है। यही है विज्ञान की विशेषता, इन्हीं सरल सिद्धांतो को खोजने में बड़े बड़े वैज्ञानिकों ने अपनी जिन्दगी को लगा दिया है और हम उसका महत्व तब भी शायद ही समझ पाते हैं जब वो मूर्त रूप में सामने भी आ जाता है और हमारे जीवन में क्रांति लाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे कुछ और ऐसा ही एक और यंत्र लेकर आऊंगा आपके सामने।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-111003617678231094?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/03/blog-post_05.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></item><item><guid isPermaLink='false'>tag:blogger.com,1999:blog-10204034.post-110988436704479610</guid><pubDate>Thu, 03 Mar 2005 20:59:00 +0000</pubDate><atom:updated>2005-03-03T13:12:47.046-08:00</atom:updated><title>सूमो चूहे और मोटापे का इलाज</title><description>भारत के हैदराबाद स्थित &lt;a href="http://icmr.nic.in/000229/nin.htm"&gt;राष्ट्रीय पोषण संस्थान &lt;/a&gt;(National Institute of Nutrition)) के कुछ वैज्ञानिक बहुत मोटे चूहों को पाल रहे हैं जिनका वजन लगभग ९०० ग्राम से लेकर १ किलो तक है। और सबसे मोटा चूहा तो १.४ किलो का है जो एक साधारण चूहे के वजन से ४ गुना ज़्यादा है। इन चूहों का भोजन होता है गेहूं, भुना चना और दूध युक्त जो कि प्रोटीन युक्त है और ये काफ़ी खाते भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आप ये सोच कर चकरा रहे होंगे कि भाई ये क्या माजरा है। बात ये है कि इन चूहों में एक ऐसा जीन हो सकता है जो कि मोटापे के इलाज के लिये बहुत कारगर साबित हो सकता है। १९९४ में न्यूयार्क की रॉकफेलर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने जेफरी फ्रीडमैन के नेतृत्व में लेप्टीन प्रोटीन नामक एक जीन की खोज की थी जिसका मोटापे की बीमारी से सम्बन्ध है। लेप्टीन प्रोटीन वसा कोशिकाओं से निकलने वाला एक हार्मोन है।  डॉ. फ्रीडमैन का कहना है कि अगर मोटे चूहों पर लेप्टीन प्रोटीनयुक्त इंजेक्शन लगाया जाता है तो उनका वज़न 30 प्रतिशत कम होता है। हालांकि भारत के सूमो चूहों पर लेप्टीन प्रोटीन का कोई असर नहीं पड़ा है यानी कोई और जीन भी है जो मोटापे के लिए ज़िम्मेदार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विस्तृत जानकारी के लिये&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2005/03/050302_sumo_rats.shtml"&gt; यहां &lt;/a&gt;पढ़ें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/10204034-110988436704479610?l=vigyaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</description><link>http://vigyaan.blogspot.com/2005/03/blog-post.html</link><author>noreply@blogger.com (खयाल)</author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></item></channel></rss>