बुधवार, अप्रैल 27, 2005

जूट की सड़कें

भारत में शायद अब शीघ्र ही जूट की सड़कें बनायी जायेंगी। इस तकनीक को आई आई टी खड़गपुर के दो वैज्ञानिकों ने विकसित किया। उनके अनुसार इनसे बनने वाली सड़कें मजबूत होंगी, भारत के मौसम के अनुकूल होंगी और समय के साथ उनका क्षय नहीं होगा क्योंकि जूट केवल सीधे धूप में खराब होता है, अन्यथा नहीं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक दलदली भूमि, बलुई मिट्टी, ज़्यादा नमी वाली मिट्टी और बाढ़ प्रभावित इलाकों में कामयाब होगी, जहाँ आमतौर पर तारकोल वाली सड़कें कामयाब नहीं हो पातीं।

<>सड़क बनाने के लिए जूट की लगभग आधा इंच मोटाई की लंबी-लंबी जमावट फैक्ट्री में की तैयार जाएगी. जिसे 'जूट मैट' कहा जा सकता है. “जूट मैट” को फैक्ट्री थान में तैयार किया जाता है। इसके बाद मिट्टी की सड़क तैयार की जाएगी. उस पर वह जूट मैट बिछा दिया जाएगा। फिर मिट्टी की मोटी परत होगी, उस पर ईंट की ज़मावट करके उसके ऊपर तारकोल की पतली परत डाल दी जाएगी। इस तरह जूट की सड़क तैयार हो जाएगी।

ये तकनीक केवल तारकोल या डामर-ईंट-गिट्टी वाली तकनीक से पांच लाख रूपये प्रति किलोमीटर सस्ती पड़ेगी। तो सोचिये कि १००० किमी लम्बी सड़क बनाने में ५० करोड़ की बचत। इसको पॉच राज्यों में पायलट स्तर पर कार्यान्वित करने के लिये केंद्र सरकार की भी मंजूरी मिल चुकी है, अब देखते हैं कि ये तकनीक भारतीय बाबुओं और अधिकारियों के रहते कितना आगे बढ़ पाती है और लोगों की मदद करती है।

विस्तृत जानकारी के लिये यहां पढ़ें।

शनिवार, अप्रैल 23, 2005

ब्रह्मांड का पहले का रूप

वैज्ञानिकों के अनुसार पहले के वर्षों में ब्रह्मांड कुछ कुछ द्रव के जैसा था। अमेरिका स्थित ब्रूकहोवन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने स्वर्ण कणों को लगभग प्रकाश की गति पर चलाकर उनको आपस में टकराया और पाया कि यद्यपि ये टकराव बहुत कम आयतन में होता है, फिर भी इससे इतनी ऊर्जा पैदा होती है कि परमाणु की नाभि के प्रोटॉन और न्यूट्रान जैसे कण पिघल जाते हैं और यहां तक कि क्वार्क और ग्लुऑन जैसे छोटे कण भी मस्त मौला होकर घूमते हैं और द्रव के समान व्यवहार करते हैं। वैज्ञानिक इन परिस्थितियों को ब्रह्मांड की शुरुआत से जोड़कर देख रहे हैं। पूरी जानकारी के लिये यहां पढ़ें।

शनिवार, अप्रैल 09, 2005

पुरुषों के लिये नया परिवार नियोजन का इन्जेक्शन

भारत मे जनसंख्या की बहुत बड़ी समस्या है, और इसके प्रति थोड़ी थोड़ी जागरुकता दिखने लगी है, लेकिन अक्सर परिवार नियोजन के लिये महिलाओ को ही कुछ उपाय अपनाने पड़ते थे, मानो कि पुरूषों की कोई जिम्मेदारी ही नही है. संजय गांधी ने नसबन्दी लाकर और एक बहुत बड़ा हव्वा खड़ा कर दिया था, जबरन नसबन्दी से भी इस प्रयास को नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली.

खैर अब आइआइटी खड़गपुर के वैज्ञानिको ने एक ऐसा इन्जैक्शन इजाद किया है जिसके लगाने से पुरूष के शरीर मे शुक्राणु निष्क्रिय हो जायगे, वो भी एक दो महीने नही, पूरे पूरे दस साल. और पुरुष जब चाहें तब इस इन्जेक्शन के प्रभाव को खत्म किया जा सकता है.

इस इन्जेक्शन के प्रारम्भिक परीक्षण सफल साबित हुए है और जल्दी ही इसे बाजार मे उतारा जायेगा और कीमत, यही कोई 40-50 रूपये. है ना मजेदार बात. एक और बात, अब चूँकि मामला शुक्राणुओ का है, इसलिये इन्जेक्शन भी उसी नस पर लगाया जायेगा, जहाँ से शुक्राणु निकलते है, सो थोड़ी सावधानी तो रखनी ही पड़ेगी.

तो फिर इन्तजार कीजिये इस इन्जेक्शन के बाजार मे उतरने का.

रविवार, अप्रैल 03, 2005

शून्य की महत्ता

अभी कुछ समय पहले एक पुस्तक पढ़ रहा था "Against the Gods: The Remarkable Story of Risk" कहानी है आदमी ने कैसे सामान्य जीवन से जुड़े खतरों को बस में करने शुरु किया। वे खतरे जिन्हें पहले जो भगवान को मंजूर कह कर आदमी कुछ नहीं करता था। मजे की बात है इस बारे में सबसे पहले लोगों ने पासे की अगली चालों पर आने वाले अंको के बारे में जानकारी के लिए प्रयोग करना शुरु किया था। लेखत श्री पीटर बर्नस्टीन बताते हैं कि खतरों को बस में करने का मानव का सबसे पहला कदम भारतीय-अरबी अंक प्रणाली की खोज थी। इस से पहले दूसरी अंक प्रणालियों में सामान्य गणित का जमा घटा बहुत मुश्किल था। सोचिए यदि आप को रोमन के XXXIX और MC को गुणा करना पड़े। इस भारतीय अंक प्रणाली की खोज में भी सबसे बड़ा फंडा था शून्य की खोज।

शून्य की खोज की महत्ता से जुड़े और बहुत से तथ्य हैं पर जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह थी पहली बार किसी ने abstract thinking की। शून्य का वैसे जीवन में क्या स्थान है। आप शून्य किलो आटा नहीं ला सकते। शून्य मील चला नहीं जा सकता। लेकिन महीषियों ने इस बारे में सोचा। यह मानव की सोच के लिए एक बहुत बड़ी छलांग थी। कभी मौका मिले तो यह पुस्तक अवश्य पढ़िएगा। बड़े रोचक तरीके से लिखी गई है।