सोमवार, जनवरी 31, 2005

स्पीकर्स या भोंगे

स्पीकर्स को हिन्दी मे क्या बोलते हैं पता नहीं पर एक खास किस्म के लम्बे स्पीकर को हमारे गांव मे भोंगा बोला जाता है - खोपडी मे किसि और शब्द कि आम अनुपलब्धि होने से भोंगा से ही फ़िलहाल काम चलते हैं। भोंगा या स्पीकर बडे काम की चीज है - ध्वनि उत्पन्न करने का वैद्युत उपकरण, अमेरिका मे बसे अधिकतर देसी अपने संगीतप्रेम का सबूत महंगे भोंगे खरीद कर देते हैं। गाने या बजाने का शौक एच १ धारी में कम ही पाया जाता है सो अपने उम्दा श्रोता होने की छटपटाहट मे आम तौर पर देसी बोस कंपनी के स्पीकर्स पर वारी-बलिहारी होते देखे जाते है। उनकी टांग खिचाई इत्मीनान से बाद मे फिर कभी।




आम देसी जो दुनिया मे कहीं भी रहता हो उसके लिए भोंगा बस एक तरह का होता है - अलग अलग आकार का मगर एक तरह का। आप किसि देसी से पूछो भोंगे कितने प्रकार के होते हैं - वो बोलेगा वूफ़र, होर्न, ट्वीटर और मिड-रेंज। देसी का दोष नही है। डायनामिक स्पीकर ८०%-९०% मारकेट पे और हिन्दुस्तान की १००% मारकेट पर राज करते हैं! डायनामिक स्पीकर्स मे आगे होता है एक कोन और पीछे होता है एक बडा चुम्बक, और एक क्वाईल। सुधी-जिज्ञासुओं को उनकी कार्य-प्रणाली पता ही है।




दो और जबर्दस्त किस्में हैं स्पीकर्स की - इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर्स और प्लेनर स्पीकर्स. इन मे भोंगा या शंकु नही होता! मगर इनमे ध्वनि आगे और पीछे दोनो तरफ़ से एक सी निकलती है! हां जनाब यह तो बस एक खासियत है. भाग दो में और लिखा जायेगा उन पर! इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर्स - एक महीन पर्दा जो आगे-पीछे हिल कर ध्वनी उत्पन्न करता है. ये पर्दा चुम्बकीय पदार्थ का बना होता है जो अपने ही आकार के विद्युतीय क्षेत्र में रखा जाता है. यह विद्युत क्षेत्र दो "स्टेटर्स" को इस झिल्ली जैसे महीन पर्दे के आगे और पीछे रख कर बनाया जाता है। पर्दा स्टेटर्स से समान दूरी पर बीच मे रखा जाता है। स्टेटर्स को बिजली के तारों से जोड कर बिजली प्रवाहित की जाती है।






स्पीकर को चलाने के लिए पर्दे पर इलेक्ट्रान का घना जमाव पावर सप्लाई का प्रयोग कर के किया जाता है। ध्वनि संकेत दोनो स्टेटर्स को भेजे जाते हैं, मगर एक खास तरीका होता है - दोनो स्टटर्स मे संकेत एक सा मगर १८० अंश पर उल्टा प्रवाहित किया जाता है। अतः जब एक स्टेटर मे संकेत क वोल्ट बढता है दूसरे मे घटता है तो बीच के पर्दे पर दोनो तरफ़ स्टेटर के चर्ज से उल्टे चार्ज जमा होते हैं इसका कुल जमा असर ये होता है की पर्दा एक साथ खीन्चा-धकेला जाता है. जब प्रवाह उलट होता है तो खीन्चाव का बल भी उलट दिशा मे जाता है. पर्दा हल्का और महीन होता है अतः उसके हिलने से पास की हवा भी हिलती है और ध्वनि पैदा होती है।

प्लेनर स्पीकर - प्लनेर स्पीकर दिखने मे तो तकरीबन इलेक्ट्रोस्टटिक स्पीकर जैसे होते हैं मगर वो डायनामिक तरीके से काम नही करते अतः इनको अलग से बिजली दिये जाने की जरूरत नही होती। प्लेनर-चुम्बकीय मे विद्युत प्रवाह को धातु की रिबिन मे प्रवाहित करते है, इस रिबन के चारो और ताकतवर चुम्बक होते हैं - तो जमावट इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर से जरा उलट सी है। रिबन मे जब करंट प्रवाहित होता है तो आगे पीछे के चुम्बक उसे खींचते-धकेलते है क्योंकि दोनो तरफ़ अलग अलग चार्ज जमा हो जाता है रिबन पर। इस के कुल-जमा प्रभाव से ध्वनि उत्पन्न हो जाती है। एक पांच फ़ुटिए की तस्वीर पेश है -



प्लेनर-मेग्नेटिक ड्राईवर मे कई फ़िट लम्बी रिबन लगाई जाती है और उच्च व मध्यम-रेंज की फ़्रीक्वेंसी या आवृत्ति को एक दम सही उत्पन्न करते हैं - जितनी कम फ़्रीक्वेन्सी की ध्वनी उत्पन्न करना होगी उतना ही रिबन का लम्बा रखना ज्यादा जरूरी होगा जिससे स्पीकर का आकार बडा रखना जरूरी होगा - इस लिए इन का वूफ़र जैसे प्रयोग के लिए उत्पन्न की गई फ़्रीक्वेन्सी के लिए कम प्रयोग होता है - शौकीनों के दूसरे कारगर उपाय होते हैं उनके बारे मे कभी और । तो इतने बडे स्पीकर्स क्यों बनाए जाते है? क्या खास है इनके बारे मे और जो एक बार इनको सुन ले वो कभी कुछ और पसंद नही करता? कोई तो बात है! ढेर सारा पैसा और प्यार उंडेला जाता है इन पर, खास सेट अप मे सुना जाता है - क्यों?? अभी अगले अंक मे इन स्पीकर्स के बारे मे क्या-क्या लिखा जायेगा सोचा नही है - मगर भाग दो आयेगा जल्दी ही.

साभार: ई-स्वामी

शनिवार, जनवरी 29, 2005

हाथियों की निपुण संवाद कला

हाथी पृथ्वी पर पाया जाने वाला सबसे बड़ा स्तनपायी जीव है. हाथी बहुत ही समझदार जीव होता है और इसे अपने दूसरे साथियों के साथ संवाद करने मे निपुणता हासिल है.क्या आपको पता है हाथी आपस मे क्या बात करते है?

हाथी का चिंघाड़ना, चिल्लाना और तरह तरह की आवाजे निकालना, मनुष्यों के लिये हमेशा से ही रहस्य बनी हुई थी. लेकिन वैज्ञानिको के शोध के बाद अब इन सभी बातों से पर्दा उठ गया है.

हाथी और उसकी संवाद कला के बारे मे बिस्तृत रूप से यहाँ पढें.

नैनो टेक्नोलोजी और हम

मैं बहुत दिनों से अपना सर इस चीज़ में खपा रहा हूं कि आखिर ये नैनोटेक्नोलाजी हमको कहां ले जायेगी और इसमें मैं भारत में रहकर क्या रिसर्च करूं। चक्कर ये है आज कल सारा शोध का पैसा इसमें और जैवविज्ञान के क्षेत्र में है इसलिये जिसे देखो वो 'नैनो' और 'बायो' कर रहा है। समस्या ये है कि हमको भी इस नाव में रोते हंसते सवार होना ही पड़ेगा यदि शोध समाज में जिंदा रहना है।

ये विषय मूलभूत स्तर पर है काफ़ी जटिल, क्योंकि सब कुछ नैनो स्तर पर होता है, भौतिक विज्ञान क़्वांटम स्तर पर चली जाती है, आकार प्रभाव पदार्थ की विशेषताओं पर अपना रंग अलग दिखाता है और पदार्थ बनाने में नानी याद आ जाती है। खैर, समस्या कठिनाई की नहीं है क्योंकि कठिनाई में ही तो मज़ा है और कुछ नया करने में हमेशा आनन्द है। समस्या है कि अभी हमारे देशवासियों को माइक्रो तो ठीक से समझ में आया नहीं है और चले नैनो करने। क्यों, वो इसलिये कि अमेरिका, जापान और यूरोप में ऐसा हो रहा है। नैनो में इतना पैसा फूंकने से अच्छा है कि पहले जो बुनियादी सुविधायें नहीं है वो बनायें, बिजली, सड़क, उच्च तकनीक से की जाने वाली कृषि और पानी। केवल नैनो नैनो करने से कुछ नहीं होगा। बिजली ही नहीं होगी क्या नैनो और क्या पिको, सब बेकार है। और अगर नैनो बना भी लिया तो इस देश में एक भी कम्पनी नहीं है device fabrication technolgy पर काम करती हो। समझ में नहीं आता कि ये भेड़चाल का क्या मतलब है।

खैर हमको कुछ करने का आइडिया आया है कुछ नैनो करने का।

अब तो नैनो ही जीवन है, नैनो ही जिंदगी है, बस दिमाग न नैनो हो जाये, वरना सब गड़बड़ हो जायेगा।

जय नैनो।

सवाल का उत्तर

अब उस सवाल का जबाब जो कि कुछ दिन पहले पूछा गया था:

Resistance यानी प्रतिरोध तब मापा जाता है जब किसी परिपथ या सर्किट में डी-सी विद्युत धारा बह रही हो और उसमें केवल प्रतिरोधक (resistor) का इस्तेमाल हो।

Impedance यानी अवरोध तब मापा जाता है जब किसी परिपथ में ऐ-सी विद्युत धारा बह रही हो और उसमें प्रतिरोधक, संधारित्र (Capacitor) और Inductance (हिंदी में ये पता नहीं क्या होता है) सब हों और अवरोध होगा कुल वोल्टेज /कुल धारा (Net Voltage/Net Current)। एक खास बात यह है कि अवरोध एक complex चीज़ है जबकि प्रतिरोध नहीं है।

आशा है कि मामला कुछ साफ हुआ। यदि आपको कुछ ज़्यादा अच्छा चमके तो प्रेषित करें।

आशीष

गुरुवार, जनवरी 27, 2005

विश्व का तापमान

एक नये शोध के मुताबिक विश्व का तापमान ११ डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो हिन्दुस्तान का तो बुरा हाल हो जायेगा और सबसे ज़्यादा उनका जिनकी जिंदगी खुले आकाश के नीचे बीतती है। पूरी जानकारी के लिये यहां पढ़ें।

सोमवार, जनवरी 24, 2005

मूंगफली के लाभ।

भारत में मूंगफली को गरीबों का बादाम कहा जाता है और गरीबों को दिल की बीमारियां भी कम होती हैं। शायद उसकी एक वजह मूंगफली हो सकती है। अमेरिका के फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में चल रहे शोध से पता चला है कि मूंगफली खाने से कैंसर और दिल की बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसमें कुछ अच्छी गुणवत्ता का प्रोटीन और चर्बी होती है जो कि उपरोक्त बीमारियों से बचाव में सहायक है। और जानकारी के लिये पूरा लेख पढ़ें।

गुरुवार, जनवरी 20, 2005

सवाल

Impedance को शीधे और सरल शब्दों में कैसे समझाया सकता है? है तो ये Resistance का भाई लेकिन थोड़ा अलग है। टिप्पणियां आमंत्रित हैं। मैं बाद में लिखूंगा जब मुझे एकदम ठीक से समझ जायेगा।

बुधवार, जनवरी 19, 2005

विज्ञान व आविष्कार

सबसे पहले तो आशीष जी का धन्यवाद जिन्होंने हमहें यहाँ बतियाने की इजाजत दी। विज्ञान शायद मेरा पहला प्यार रहा होगा। शायद तीसरी कक्षा में था जब एक पत्रिका का चसका लग गया, नाम था विज्ञान। अब अम्बाला एक छोटा शहर है। इसलिए पत्रिका आस पास मिलती नहीं थी बस-स्टैंड से जाकर लानी पड़ती थी। पूरे डेढ़ रुपए की। फिर एक और पत्रिका पढ़नी आरम्भ की आविष्कार । वह भी काफी अच्छी थी व खुद करके देखो के सिधांत पर चलती थी। अब यह यहाँ इस लिए लिख रहा हूँ कि मैं यह सब हिन्दी में ही पढ़ता था। कुछ वैसी ही भावना आज यह लिखते हुए आ रही है। पता नहीं आज कोई पंकज अम्बाला में हिन्दी में विज्ञान की पत्रिका पढ़ता है कि नहीं। ऐसी पत्रिकाएं हैं भी कि नहीं।

मंगलवार, जनवरी 18, 2005

मोबाइल के दुश्प्रभाव

आज लगभग सब लोग मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं और शायद ये जिन्दगी का एक अभिन्न अंग भी बन गया है। पर अगर आपको मालूम चले कि इसको इस्तेमाल करने से आपके मस्त्रिष्क पर दुश्प्रभाव प्रभाव पड़ सकता है तब भी क्या आप इसको वैसे ही इस्तेमाल करना चाहेंगे? हाल ही में स्वीडन की लुंड (Lund) यूनिवर्सिटी के सदस्य डॉ सल्फ़ोर्ड और उनके साथियों द्वारा चूहों पर किये गये वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि जी एस एम मोबाइल फोन से निकलने वाली माइक्रोवेव किरणें चूहों के मस्तिष्क पर पर बहुत गहरा व घातक प्रभाव छोड़ती हैं। इस शोध के फलस्वरूप कई मोबाइल कंपनियां सकते में हैं और कई ने इसका खंडन करने की कोशिश भी की है। बहरहाल यदि आप हैंड फ़्री सेट का प्रयोग करें तो शायद ये आपकी सेहत के लिये मुनासिब होगा। अधिक जानकारी यहां मिल सकती है।

विज्ञान: वरदान या अभिशाप

विज्ञान वरदान है या अभिशाप, ये काफ़ी संदेदनशील मुद्दा है। कारण: कुछ लोग जिनकी रोज़ी रोटी विज्ञान से चल रही है या जिनको इससे व्यक्तिगत जिंदगी में फ़ायदा होता है उनको तो ये वरदान लगती है और जिनकी जिंदगियां इसकी वजह से तबाह हुईं हैं उनको अभिशाप। लेकिन क्या ये विभक्तीकरण इतना सरल है? शायद नहीं!

चलिये पहले हम बात करते हैं कि विज्ञान वरदान क्यों है:

विज्ञान वरदान इसलिये है क्योंकि इसनें ऐसी चीजों का आविष्कार किया है जिसने मानव जीवन को काफ़ी हद तक सरल बना दिया है जैसे कि बिजली, मशीनों, इंजनों, यातायात के तेज साधन जैसे रेलगाड़ियों या विमानों, रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन, और कम्प्यूटर का आविष्कार। इन सब वस्तुओं ने मानव जीवन में जैसे क्रांति ला दी है। सूचना का प्रचार-प्रसार पहले से कहीं ज़्यादा सरल और सुलभ हो गया है। आदमी आज मशीनों की मदद से कई सारे वो काम कर सकता है जिनको कि पहले सोचना भी मुश्किल था। सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण क्रांति आयी है चिकित्सा के क्षेत्र में। कई सारे रोग जो कि पहले असाध्य होते थे जैसे कि पोलियो, चेचक इत्यादि, आज उन पर दवाओं के द्वारा काफ़ी हद तक काबू पा लिया गया है, बच्चे जीवन भर पंगु नहीं रहते हैं, आंखों की कई बीमारियों का आज हल है, शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में हुयी उन्नति आज कई सारे रोगों की प्रभावी चिकित्सा कर सकती है। और भी कई सारे उदाहरण हैं जो कि चिकित्सा क्षेत्र में विज्ञान के अच्छे प्रभाव के बारे में दिये जा सकते हैं और जिन्होंने मानव जीवन को बहुत सहायता दी है। कम्प्यूटर की मदद से आज आप लिख सकते हैं, जानकारी को संचित कर सकते हैं, आदान प्रदान कर सकते हैं, प्रोग्रामिंग कर सकते हैं व कई सारी चीज़ों का लेखा जोखा बनाया जा सकता है, इँटरनेट की मदद से आप खरीददारी, बैंकिंग़, पढ़ाई इत्यादि बहुत सारे काम बैठे बैठे ही कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण योगदान मेरे खयाल से रहा है बिजली या विद्युत ऊर्जा का क्योंकि इसी की वजह से उपरोक्त आविष्कार संभव हो पाये हैं और मनुष्य कई सारी कल्पनाओं को अंज़ाम दे पाया है। इन सबके अलावा और भी कई सारी चीज़ें आप सोच सकते हैं जिन्होंने आपकी जिंदगी बेहतर बनायी है व जिनके बिना जीने की कल्पना करना भी कठिन है।

अब बात करते हैं कि विज्ञान अभिशाप क्यों हो सकता है?

विज्ञान ने जहां हमको जीवन की तमाम सुख सुविधायें दी हैं वहीं परिणाम स्वरूप कई ऐसी चीज़ें भी दी हैं जिन्होंने मानवजीवन में ज़हर घोला है व जिनसे मानव अस्तित्व हमेशा के लिये खतरे में पड़ सकता है। कहते हैं न कि विरोधाभासी मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं। ये कहावत यहां भी चरितार्थ होती है। विज्ञान ने पैदा किया है प्रदूषण और पर्यावरणीय असंतुलन, जो कि पृथ्वी पर मानव के अस्तित्व के लिये खतरनाक है, बहुमूल्य तत्वों या अयस्कों की खानों के खनन के लिये पृथ्वी का गर्भ खोदा जा रहा है जिसके पर्यावरण संबन्धी दुश्परिणाम दूरगामी होंगे। कम्प्यूटरों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के रूप में सिलिकॉन, प्लास्टिक एवं अन्य विषैले पदार्थों का कचरा तैयार हो रहा है जिसके परिणाम बहुत घातक होंगे। बेहिसाब औद्योगिकीकरण और कार्बनयुक्त ईंधन पर आधारित यातायात व्यवस्था के कारण पृथ्वी का तापमान पिछले कुछ दशकों में कई डिग्री बढ़ा है जिससे कि कई सारे जीवों (जल व थल) की प्रजातियां या तो समाप्त हो गयी हैं या समाप्त होने की कगार पर हैं व कई जगहें कृषि के उपयुक्त नहीं रह गयी हैं। दवाओं के परीक्षण के लिये लाखों जानवरों को मार डाला जाता है जो कि भयंकर जैविक असंतुलन की स्थिति पैदा करता है और उनकी वजह से कई बेबस जानवर खतरनाक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। नाभिकीय ऊर्जा के दुश्परिणाम हम पहले नागासाकी और हिरोशिमा में देख चुके हैं और नाभिकीय कचरा आज एक बहुत बड़ी पर्यावरणीय चुनौती है। पेड़ों की कटायी एक बहुत बड़ी समस्या है, जिसका कि एक दुश्परिणाम आये दिन बाढ़ आना है। दुनिया भर के हिमनाद या ग्लेशियर आज तापमान वृद्धि के कारण पिघल रहे हैं और उनका पानी समुद्र में जा रहा है जिसकी वजह से समुद्रों का जलस्तर बढ़ रहा है और कई सारे शहर (मुंबई, करांची, ब्राजील के कुछ शहर एवं कुछ यूरोपीय व अमेरिकी शहर) व द्वीप (जैसे कि मालद्वीव) इस शताब्दी के अंत में या उससे पहले डूबने की कगार पर है। मानव की स्वाभाविक लोभलिप्सा इन सब आविष्कारों के चलते और बढ़ी है जिससे उत्पादन बढ़ाने के चक्कर में प्राकृ‍तिक श्रोतों का ह्रास हो रहा है।

तो कुल मिलाकर यदि देखा जाये तो, मेरी राय में, विज्ञान अपने आप में घातक नहीं बल्कि घातक है मानव की लिप्सा या लोभ की प्रवृत्ति जिसने कि हमेशा ज़्यादा से ज़्यादा चाहा है और उसी चाहत के चक्कर में हमनें प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा अनाप-शनाप दोहन किया है कि आज अत्यन्त गंभीर पर्यावरणीय समस्या उत्पन्न हो गयी है और शायद इसका बदला प्रकृति हमसे भूकम्प या सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में लेती है। इसलिये विज्ञान तो अपनी जगह ठीक है क्योंकि उसका मतलब है ज्ञान से न कि विनाश से, पर हम लोग गलत हैं जो कि भोग के फेर में पड़ के प्रकृति के साधारण नियमों को भुला बैठे हैं और फिर किस्मत को रोते हैं और विज्ञान को गाली देते हैं। दुख की बात ये है कि इन सबके ज़िम्मेदार पढ़े लिखे और धनवान लोग ज़्यादा हैं और दोषारोपण निर्धन के ऊपर होता है।

सोमवार, जनवरी 17, 2005

शहरों के नीचे खोदना घातक हो सकता है!

पढ़ने में आया है कि शहरों में ज़मीन के नीचे यातायात का तंत्र बिछाना या शॉपिंग मॉल और दुकानें खोलना या पार्किंग बनाना इत्यादि खतरे से खाली नहीं है क्योंकि ये गंभीरे प्राकृतिक आपदाओं को दावत देने वाला काम हो सकता है। ये खासतौर से भूकम्प लाने में या उसके प्रभाव को बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। इसके अलावा बाढ़ का खतरा भी ज़्यादा हो सकता है। विस्तृत जानकारी के लिये यहां लेख पढ़ें।

रविवार, जनवरी 16, 2005

श्री गणेश!

वैसे तो मैं कुछ दिनों से ब्लॉग लिख रहा हूं और ज़्यादातर सामान्य विषयों पर ही भौंकता रहा हूं। सोचा कि क्यों न अपने कार्यक्षेत्र के बारे में भी कुछ लिखा जाये। असल में दूसरे ब्लॉग में भी विज्ञान से जुड़ा कुछ लिखा था एक दो बार पर लगा कि वो शायद बाकी चीज़ों में खो जाता है, इसलिये कुछ अलग से करने का विचार आया मन में।

तो गंगा में डु्बकी मारकर इसकी शुरुआत करते हैं एक प्रश्न से:

विज्ञान वरदान है या अभिशाप?

इस विषय पर सोचते हैं कुछ समय फिर इसको आगे बढ़ाते हैं, कम से कम प्रश्न से शुरुआत तो की।