शनिवार, फ़रवरी 05, 2005

सङ्गणक यानी कम्प्यूटर की याददाश्त

हममें से जो भी इस लेख को पढ़ सकते हैं निश्चित रूप से उनको कम्प्यूटर का प्रयोग करना आता है। आप ये भी जानते हैं कि जब आप अपने सङ्गणक या कम्प्यूटर पर काम करते हैं, आप अपने लेखों, आकड़ों इत्यादि को क्म्प्यूटर पर रक्षित करके रख सकते हैं यानी कि save कर सकते हैं। आपको शायद ये भी मालूम है कि सभी कम्पयूटरों में आजकल जानकारी को रक्षित करने के लिये कुछ चीजों का इस्तेमाल होता है जिनको कि कहते हैं ‘मेमोरी’। इस लेख के द्वारा ये बताया जायेगा कि ये मेमोरी यानी कम्प्यूटर की याददाश्त कैसे काम करती है।

हर कम्प्यूटर में दो तरह की मेमोरी होती है:

एक होती है DRAM या डी-रैम यानी Dynamic Random Access Memory जिसमें कि जानकारी अस्थायी तौर से सुरक्षित रहती है और उसके लिये निरंतर बिजली की आवश्यकता होती है। अगर आपकी पॉवर सप्लाई या ऊर्जा का श्रोत बंद हो जाये तो ये उस जानकारी को सुरक्षित नहीं रखा पायेगी। इसलिये इसको तकनीकी भाषा में volatile memory या अस्थायी मेमोरी भी कहते हैं। इसकी विशेषतायें हैं कि ये बहुत तेज़ चलती है, और इसका बिट घनत्व यानी बिट डेन्सिटी भी बहुत होता है। बाज़ार में ये कई क्षमताओं में उपलब्ध है जैसे कि १२८, २५६ मेगाबाइट्स या उससे ज़्यादा।

(डीरैम)

दूसरी होती हैं हार्ड डिस्क या hard disk जिसका कि मुख्य काम है जानकारी को हमेशा के लिये सुरक्षित रखना और वो जानकारी तभी हटा यी जा सकेगी यदि आप उसे स्वयं हटाना चाहते हैं। इस मेमोरी की खास बात ये है कि ये बिजली चले जाने के बावज़ूद जानकारी को सुरक्षित रखती है जैसे कि जब आप कम्प्यूटर बन्द कर देते हैं तो आपके आंकड़े इसी डिस्क में सुरक्षित रहते हैं। इस मेमोरी को तकनीकी भाषा में ‘स्थायी मेमोरी’ या ‘non-volatile’ मेमोरी भी बोलते हैं। ये विभिन्न प्रकार की क्षमताओं में उपलब्ध है जैसे कि १०, २०, ४०, ८० गीगाबाइट्स या उससे भी ज़्यादा ।

(हार्डडिस्क)

मूल स्तर पर हार्ड डिस्क को आप एक कैसेट टेप की तरह भी मान सकते हैं क्योंकि दोनों का सिद्धांत एक ही है।

तो सवाल ये है कि हम अस्थायी मेमोरी का उपयोग क्यों करते हैं? उसका उत्तर ये है कि हार्ड डिस्क की आंकड़ों के संचालन की गति काफ़ी कम होती है इसलिये कम्प्यूटर पर काम करते समय जानकारी को अस्थायी तौर पर डीरैम में रक्षित किया जाता है और फिर कुछ समय के अंतर पर उसको हार्ड डिस्क में बार बार रक्षित करना पड़ता है। इसलिये डीरैम की क्षमता जितनी ज़्यादा होगी आप उतने ही ज्यादा काम कम्प्यूटर पर एक साथ कर सकते हैं ।

डीरैम की इस तेजी का करण है वो पदार्थ जो कि इस मेमोरी का मुख्य भाग (core element) होता है औरवे पदार्थ होते हैं कुचालक (insulator) पदार्थ यानी डाइ-इलेक्ट्रिक (Dielectric) पदार्थ जैसे कि सिलिकॉन ऑक्साइड (SiO2), टैन्टेलम ऑक्साइड (Ta2O5) इत्यादि जिनका डाइ-इलेक्ट्रिक स्थिरांक इस बात का सूचक होता है कि वे कितनी ज़्यादा जानकारी रक्षित कर सकते हैं। इस पदार्थ की ये विशेषता है कि ये जानकारी को बहुत तेजी से संचालित करता है, (नैनोसेकंडों या 0.000000001 s में), लेकिन बिजली के अभाव में काम नहीं कर सकता है।

हार्ड डिस्क का मेमोरी वाला हिस्सा जहां जानकारी स्थायी रूप से संचित की जाती है मुख्यतः लौह-चुम्बकीय (Ferromagentic) पदार्थों जैसे कि लोहा-कोबॉल्ट या Fe-Co का बना होता है। असल में ये पदार्थ एक प्लेट पर एक परत के रूप में जमा किया जाता है (magnetically coated substrate) । इस पदार्थ में जानकारी का रक्षण इलेक्ट्रान (पदार्थों के परमाणुओं के अन्दर उपस्थित एक अतिसूक्ष्म कण या तरंग) के स्पिन (spin) के घुमाव की एक दिशा में होने के कारण होता है। इस तरह के पदार्थों की विशेषता यह होती है कि ये बिजली की अनुपस्थिति में भी जानकारी को सुरक्षित रख सकते हैं। पर इनकी कमी ये है कि ये जानकारी का संचालन धीमी गति से करते है (माइक्रोसेकंडों या 0.000001 s में)।

इन मूलभूत कारणों की वजह से यद्यपि हार्डडिस्क जानकारी को खोती नहीं है पर चूंकि डीरैम तेज़ काम करती है, इसलिये उसकी कम्प्यूटर में ज़रूरत है।

तो, दोस्तों, उम्मीद है आपकी अपने कम्प्यूटर की मेमोरी के बारे में जानकारी और बढ़ी होगी। कम्प्यूटर की मेमोरी का वैज्ञानिक भंडार विशाल है, इसलिये ये लेख बहुत ही साधारण है जो कि आम जन को मेमोरी से अवगत कराने के लिये है। आगे के लेखों में मेमोरी के काम करने की तकनीक के बारे में और लिखा जायेगा।